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भारत के 40 करोड़ बच्चों को कोरोना टीके का करना होगा और इंतजार…दाम पर नहीं हो पा रही सहमति

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नई दिल्ली (एजेंसी)। दुनिया के कई देशों ने अपने बच्चों को कोरोना रोधी टीका लगाना शुरू कर दिया है, लेकिन भारत के 40 करोड़ बच्चों का इंतजार बढ़ता ही जा रहा है। सरकार से जुड़े सूत्रों के मुताबिक जायकोव-डी के बच्चों वाले टीके को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन कीमत पर अब तक सहमति नहीं बन पाने के कारण यह अभी बाजार में नहीं आ पा रहा है।

vaccine for children

इसके पहले आईसीएमआर-एनआईवी की निदेशक ने सितंबर तक बच्चों का कोरोना टीका आने का दावा किया था, लेकिन दाम पर सहमति नहीं बनने के कारण ऐसा नहीं हो सका। सूत्रों के मुताबिक सरकार टीके के दाम में कमी चाहती है। जायकोव-डी टीके को लगाने के लिए सूई की जगह जेट इंजेक्टर का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए अप्लीकेटर की भी जरूरत पड़ती है। सरकार इंजेक्टर और अप्लीकेटर का भी दाम कम कराना चाहती है।

इसके पहले नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वीके पॉल ने भी माना था कि जायडस कैडिला के टीके की कीमत को लेकर मामला फंसा है। हालांकि माना जा रहा है कि अब सरकार हफ्तेभर के अंदर जायकोव-डी टीके की कीमत पर जारी गतिरोध को खत्म करके आगे बढ़ना चाहती है। इस बाबत पूछने पर राष्ट्रीय टीकाकरण तकनीकी सलाहकार ग्रुप (एनटीएजीआई) के चेयरमैन डॉ. एनके अरोड़ा ने कहा कि बच्चों का टीकाकरण जल्द शुरू किया जाएग। उन्होंने बताया कि पहले से कई तरह की बीमारियों से पीड़ित और संक्रमण के लिहाज से अधिक जोखिम वाले बच्चों का टीकाकरण किया जाएगा।

बच्चों की कई वैक्सीन का परीक्षण: 

1- जायडस कैडिला का जायकोव-डी : अहमदाबाद स्थित कंपनी के इस टीके को डीसीजीआई की मंजूरी मिल चुकी है। जायकोव-डी की तीन खुराक 12 से 18 साल के बच्चों को दी जाएगी। हर खुराक में दो मिलीग्राम वैक्सीन होगी। इस तरह कुल छह मिलीग्राम वैक्सीन लगाई जाएगी। यह वैक्सीन दुनिया की पहली डीएनए आधारित वैक्सीन है। हालांकि कंपनी दो खुराक वाला टीका बनाने की भी मंजूरी लेगी।

2- भारत बायोटेक का टीका कोवैक्सीन: हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक की निदेशक कृष्णा एला के मुताबिक बच्चों को दिए जाने वाले कोवैक्सीन टीके का क्लीनिकल ट्रायल पूरा हो चुका है। कंपनी ने भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) को ट्रायल का डाटा सौंप दिया है, लेकिन अभी मंजूरी नहीं मिली है। इसे 2 से 18 साल के बच्चों को दिया जाएगा।

3- नोवावैक्स का कोवावैक्स: इस टीके के तीसरे और अंतिम चरण का ट्रायल पुणे में जारी है। अमेरिकी कंपनी नोवावैक्स ने इसे तैयार किया है, लेकिन पुणे स्थित दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट इसका उत्पादन करेगी। यह टीका 12 से 18 साल के बच्चों को दिया जाएगा।

दौड़ में शामिल अन्य टीके: भारत में बच्चों के लिए टीके बनाने के लिए कई कंपनियां रेस में हैं। जेनोवा कंपनी ने देश का पहला एमआरएनए आधारित टीका बनाया है और इस टीके के क्लिनिकल ट्रायल की अनुमति मिल गई है। इसी तरह हैदराबाद स्थित बॉयोलॉजिकल ई के भी टीके को क्लिनिकल ट्रायल की अनुमति मिल चुकी है। दुनिया की बात करें तो फाइजर, मॉडर्ना समेत कई अन्य कंपनियां बच्चों के कोरोना टीके बना रही हैं।

बच्चों के टीकाकरण पर वैज्ञानिक एक मत नहीं : बच्चों के टीकाकरण को लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिकों में आमसहमति नहीं हैं। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि कुछ शोध में यह पाया गया है कि कोरोना का टीका बच्चों को फायदा करने से अधिक नुकसान पहुंचाता है। यही वजह है कि ब्रिटेन की संयुक्त समिति ने बच्चों को टीका नहीं लगाने की सिफारिश की थी। बच्चों में टीके का समर्थन नहीं करने का दूसरा सबसे कारण यह है कि जब कोरोना का प्रभाव बच्चों पर ना के बराबर पड़ता है, तो फिर टीकाकरण करना गैर जरूरी है। हालांकि दूसरा कारण काफी कमजोर है, क्योंकि कई देशों में बड़ी संख्या में बच्चों के संक्रमित होने के मामले आए हैं।

दो साल के बच्चों का टीकाकरण : दुनिया में दो साल तक के बच्चों का टीकाकरण शुरू हो चुका है, तो अमेरिकी दवा कंपनी फाइजर छह माह के बच्चों के लिए भी टीका विकसित करने में जुटी है। क्यूबा दुनिया का पहला देश है जिसने दो साल से कम उम्र के बच्चों का टीकाकरण शुरू कर दिया। क्यूबा ने स्वदेश निर्मित टीके का इस्तेमाल किया। कई अन्य देश भी दो साल के बच्चों को टीका लगाने की तैयारी में हैं।


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